Dravyaguna

 

औषधीय पादप संदर्भिका: गुण, कर्म, एवं प्रयोग



1.0 परिचय: द्रव्यगुण विज्ञान का महत्व

द्रव्यगुण विज्ञान आयुर्वेद की वह आधारभूत शाखा है जो औषधीय द्रव्यों (पदार्थों) के गुण, कर्म एवं उनके चिकित्सकीय प्रयोगों का विस्तृत विवेचन करती है। इसे आयुर्वेदिक भेषजगुण विज्ञान (Ayurvedic Pharmacology) की संज्ञा दी जा सकती है। किसी भी पादप की चिकित्सीय क्षमता का विश्लेषण उसके मौलिक सिद्धांतों -  रस  (द्रव्य का जिह्वा से संपर्क होने पर होने वाला प्रत्यक्ष ज्ञान),  गुण  (द्रव्य के भौतिक एवं सूक्ष्म गुण),  वीर्य  (द्रव्य की शक्ति या उष्ण/शीत प्रभाव), एवं  विपाक  (पाचन के उपरांत द्रव्य का परिवर्तित प्रभाव) - के आधार पर किया जाता है। यह विश्लेषणात्मक ढाँचा हमें यह समझने में सहायता करता है कि कोई द्रव्य शरीर में प्रवेश करने के उपरांत किस प्रकार कार्य करेगा और किन रोगों में प्रभावी होगा। प्रस्तुत संदर्भिका में, हम इसी शास्त्रीय दृष्टिकोण का अनुसरण करते हुए कुछ प्रमुख औषधीय पादपों के गुण-कर्मों का विस्तृत विवरण प्रस्तुत कर रहे हैं।

2.0 पादप विवरणिका (Plant Profiles)

यह खण्ड प्रमुख औषधीय पादपों की एक व्यवस्थित सूची प्रस्तुत करता है, जिसमें उपलब्ध स्रोत सामग्री के अनुसार उनके गुणधर्मों और पारंपरिक उपयोगों का विवरण दिया गया है।

2.1 बला (Sida cordifolia Linn.)
  • कुल:  माल्वेसी (Malvaceae)

  • लैटिन नाम:   Sida cordifolia Linn.

  • रस:  मधुर

  • विपाक:  मधुर

  • वीर्य:  शीत

  • गुण:  लघु, स्निग्ध, पिच्छिल

  • कर्म व प्रयोग:  यह बल्य (शक्तिवर्धक), वृष्य (प्रजनन क्षमता बढ़ाने वाला), वात शामक, पित्त-रक्त शामक, ग्राही (मल को बांधने वाला), सन्धानकारक (टूटे हुए को जोड़ने वाला), मूत्रल (मूत्रवर्धक), एवं शुक्रल (शुक्रवर्धक) है। इसका प्रयोग वातव्याधि (विशेषकर आमवात), हृदय दौर्बल्य, शुक्रक्षय, योनिरोग, मूत्रकृच्छ (पेशाब में कठिनाई), प्रमेह, प्रदर, और मेधा (बुद्धि) वर्धन हेतु किया जाता है।

  • प्रयोज्य अंग:  मूल (जड़), पञ्चांग (सम्पूर्ण पौधा), बीज


2.2 अतिबला (Abutilon indicum)
  • कुल:  माल्वेसी (Malvaceae)

  • लैटिन नाम:   Abutilon indicum

  • रस:  मधुर

  • विपाक:  मधुर

  • वीर्य:  शीत

  • गुण:  स्निग्ध

  • कर्म व प्रयोग:  यह वात-पित्त शामक, रसायन (कायाकल्प करने वाला), बल्य, वृष्य, ग्राही, मूत्रल, शुक्रल, मेदवर्धक एवं दाहशामक है।

  • प्रयोज्य अंग:  मूल (जड़), वल्कल (छाल), पत्र (पत्ते), बीज

2.3 नागबला (Grewia hirsuta Vahl)
  • कुल:  टिलिएसी (Tiliaceae)

  • लैटिन नाम:   Grewia hirsuta Vahl

  • रस:  मधुर, कषाय

  • विपाक:  मधुर

  • वीर्य:  शीत

  • गुण:  गुरु, स्निग्ध, पिच्छिल

  • कर्म व प्रयोग:  यह वात-पित्त शामक, रसायन, बल्य, वृष्य, ग्राही, मूत्रल, शुक्रल, मेदवर्धक एवं दाहशामक है।

  • प्रयोज्य अंग:  मूल (जड़), कंद

2.4 शाल्मलि (Salmalia malabarica)
  • कुल:  बॉम्बेकेसी (Bombacaceae)

  • लैटिन नाम:   Salmalia malabarica

  • रस:  मधुर, कषाय (तिक्त)

  • विपाक:  मधुर

  • वीर्य:  शीत

  • गुण:  लघु, स्निग्ध, पिच्छिल

  • कर्म व प्रयोग:  यह वात-पित्त शामक, कफकर, मूत्रसंग्रहणीय (मूत्र की मात्रा कम करने वाला), शुक्रल, ग्राही, वृष्य, दाह एवं शोथ को हरने वाला है। इसका प्रयोग रस-रक्तगत कुष्ठ, प्रवाहिका, कास, ग्रहणी आदि रोगों में होता है।

  • प्रयोज्य अंग:  पुष्पनिर्यास (मोचरस), पुष्प, मूल, त्वक् (छाल), काष्ठ, फल, कण्टक

2.5 गोक्षुर (Tribulus terrestris)
  • कुल:  जाइगोफाइलेसी (Zygophyllaceae)

  • लैटिन नाम:   Tribulus terrestris

  • रस:  मधुर

  • विपाक:  मधुर

  • वीर्य:  शीत

  • गुण:  गुरु, स्निग्ध

  • कर्म व प्रयोग:  यह वात-पित्त शामक, कफकर, मूत्रल, वृष्य, बल्य, दीपन (पाचन-अग्नि वर्धक) एवं शोथहर (सूजन कम करने वाला) है। विशेष रूप से यह पथरी (अश्मरी) भेदन, हृदय रोगों तथा प्रमेह में लाभकारी है।

  • प्रयोज्य अंग:  मूल, फल (विशेषतः फल), पञ्चांग

2.6 चांगेरी (Oxalis corniculata)
  • कुल:  ऑक्जालिडेसी (Oxalidaceae)

  • लैटिन नाम:   Oxalis corniculata

  • रस:  अम्ल, कषाय

  • विपाक:  अम्ल

  • वीर्य:  उष्ण

  • गुण:  लघु, रूक्ष

  • कर्म व प्रयोग:  यह कफ-वात शामक, पित्तवर्धक, प्रमेह नाशक, वात अनुलोमन करने वाला है। इसका उपयोग ग्रहणी, अर्श (बवासीर) एवं शिरःशूल में होता है।

  • प्रयोज्य अंग:  पञ्चांग (विशेषतः पत्र)

2.7 निम्बुक (Citrus acida)
  • कुल:  रूटेसी (Rutaceae)

  • लैटिन नाम:   Citrus acida

  • रस:  अम्ल

  • विपाक:  मधुर

  • वीर्य:  अनुष्ण (न अधिक गर्म न अधिक ठंडा)

  • गुण:  लघु, स्निग्ध

  • कर्म व प्रयोग:  यह वातनाशक, पित्त का अनुलोमन करने वाला, अग्निदीपक (पाचन शक्ति बढ़ाने वाला), आमपाचक (अधपचे भोजन को पचाने वाला) तथा विषम ज्वर नाशक है।

  • प्रयोज्य अंग:  फल

2.8 बिल्व (Aegle marmelos)
  • कुल:  रूटेसी (Rutaceae)

  • लैटिन नाम:   Aegle marmelos

  • रस:  कषाय, तिक्त

  • विपाक:  कटु

  • वीर्य:  उष्ण

  • गुण:  लघु, रूक्ष

  • कर्म व प्रयोग:  यह कफ-वात शामक, पित्तकर, शोथहर, दीपन, कृमिघ्न (कृमिनाशक), ग्राही एवं आमपाचक है। विशेषकर इसके अपक्व फल का प्रयोग आम दोष (पाचन संबंधी विषाक्तता) में होता है।

  • प्रयोज्य अंग:  मूलत्वक् (जड़ की छाल), पत्र, फलमज्जा (फल का गूदा), अपक्व फल

2.9 तेजोवती (Zanthoxylum armatum)
  • कुल:  रूटेसी (Rutaceae)

  • लैटिन नाम:   Zanthoxylum armatum

  • रस:  कटु, तिक्त

  • विपाक:  कटु

  • वीर्य:  उष्ण

  • गुण:  लघु, रूक्ष, तीक्ष्ण

  • कर्म व प्रयोग:  यह कफ-वात शामक, पित्तकर, दीपन, पाचन है। दन्तशूल, मुखरोग, कास, श्वास, एवं हिक्का (हिचकी) में इसका विशेष उपयोग होता है।

  • प्रयोज्य अंग:  फलत्वक् (फल की छाल), काष्ठ, बीज

2.10 गुग्गुल (Commiphora mukul)2.10 गुग्गुल (Commiphora mukul)
  • कुल:  बर्सेरेसी (Burseraceae)

  • लैटिन नाम:   Commiphora mukul

  • रस:  कटु, तिक्त, कषाय

  • विपाक:  कटु

  • वीर्य:  उष्ण

  • गुण:  लघु, रूक्ष, तीक्ष्ण, सर (गति प्रदान करने वाला), विशद (चिपचिपापन दूर करने वाला), सुगन्धि

  • कर्म व प्रयोग:  यह कफ-वात शामक, बल्य, वृष्य, रसायन, शोथहर, मेदोहर (वसा कम करने वाला), भग्नसन्धानकर (हड्डी जोड़ने वाला), आमपाचक एवं व्रणरोपण (घाव भरने वाला) है।

  • प्रयोज्य अंग:  निर्यास (गोंद)

2.11 निम्ब (Azadirachta indica)
  • कुल:  मेलिएसी (Meliaceae)

  • लैटिन नाम:   Azadirachta indica

  • रस:  तिक्त, कषाय

  • विपाक:  कटु

  • वीर्य:  शीत

  • गुण:  लघु, रूक्ष

  • कर्म व प्रयोग:  यह कफ-पित्त शामक, व्रणशोधक एवं रोपक, ज्वरघ्न, कृमिघ्न, रक्तदोषहर, ग्राही, सन्धानकर, कुष्ठघ्न (त्वचा रोगों को नष्ट करने वाला) एवं मेहघ्न है।

  • प्रयोज्य अंग:  पत्र, पुष्प, फल, त्वक्, मज्जा, बीज, पञ्चांग


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